छत्तीसगढ़ में पर्यटन एवं पर्यावरणीय प्रदूषण

Tourism and Environmental Pollution in the Chhattisgarh

 

Dr. K. S. Gurupanch

Principal, M.J. College, Kohka Junwani Road, Bhilai (C.G.)

 

भूमिका-

प्रकृति की सुरम्यता छत्तीसगढ़ के कण-कण में समाहित है। कल-कल निनादित नदियाँ, संगीत के सुरों को सहेजते झरने, प्रकृति प्रदत्त गुफाएँ, वन्य पशु पक्षियों, वृक्षों से आच्छादित एवं झींगुरों में झंकृत वन्य प्रांत छत्तीसगढ़ की शोभा में द्विगुणित विस्तार करते हैं।

 

अतीत के अवशेषों से युक्त प्रस्तर खण्डों से निर्मित किले तथा भग्नावशेष, शिल्पियों द्वारा प्रस्तर खण्डों में उकेरी गई मूर्तियाँ अनायास ही पर्यटकों का मन मोह लेती है। भारत के प्रायः सभी राज्यों में पर्यटन को प्रोत्साहन दिया जा रहा है साथ ही प्रदूषण भी उसी अनुपात में फैल रहा है। नवम्बर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना के बाद पर्यटन के विषय में जागरूकता बढ़ी है ।

 

छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना के अवसर पर 06-07 नवम्बर 2007 को पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान छत्तीसगढ़ की खूबसूरत वादियों को खूब सराहा । उनके स्मृति पटल पर यहाँ के पर्यटन स्थलों, बस्तर के मनोरम चित्रकोट, हरे भरे जंगलों और यहाँ के सरल जीवन के चित्र उभर रहे थे, जो राज्य को प्राकृतिक पर्यटन स्थलों की समृद्धि को दर्शाता है । इसके साथ ही छत्तीसगढ़ राज्य भविष्य में बायोडीजल उत्पादन के कारण डायमंड स्टेट कहलाये, ऐसी आशा व्यक्त की ।

 

ऐतिहासिक महत्व-

प्राचीन काल में मनुष्य विभिन्न स्थलों की खोज, तीर्थ यात्राओं, व्यापार, व्यवसाय के लिए यात्राएँ किया करता था परंतु आजकल लोग मनोरंजन एवं आनंद के लिए यात्रा करने लगे । पर्यटन के महत्व को 20 वीं सदी के पाँचवे दशक से स्वीकार किया गया । राष्ट्रीय विकास परिषद ने वर्ष 1984 में पर्यटन को उद्योग का दर्जा देकर उसके महत्व में वृद्धि की है ।

 

छत्तीसगढ़ राज्य में पर्यटन हेतु नई पर्यटन नीति, अन्य भारतीय राज्यों एवं आसपास के विभिन्न देशों की उत्कृष्ट रीतियों के विश्लेषण पर विकसित की गई है । भारत के मध्य में स्थित छत्तीसगढ़ राज्य ऐतिहासिक, पुरातात्विक, पौराणिक, धार्मिक, प्राकृतिक, पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक महत्व के बहुकोणीय पर्यटन स्थलों में संपन्न है। इस प्रकार पर्यटन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है तभी देश-विदेश के सैपाटी छत्तीसगढ़ की ओर आकर्षित होंगे । प्रस्तुत शोध-पत्र में छत्तीसगढ़ का सामान्य परिचय, ऐतिहासिक परिचय, राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य एवं अन्य पर्यटन स्थलों की सौंदर्य कुषमा का वर्णन किया गया है ।

 

पर्यटन का सामान्य अर्थ बाहर घूमने तथा ठहरने वाले व्यक्तियों से संबंधित गतिविधिया को कहा जा सकता है । 13 वीं शताब्दी में ज्वनतपेज शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग हुआ जो सैर-सपाटे के लिए यात्रा करते थे । सन 1937 में राष्ट्रसंघ ने एक सर्वमान्य परिभाषा प्रतिपादित की, इसके अनुसार-

 

श्ज्ीम ज्मतउ जवनतपेज ेींसस पद चतपदबपचंस इम पदजमतमेजमक जव उमंद ंदल चमतेवद जतंअमसपदह वित ं चमतपवक व ि24 ीवनते वत उवतम पद ं बवनदजतल वजीमत जींद ूीपबी इम नेनंससल तमेपकमेश्ण्

 

सामान्यतया सैर-सपाटे और उत्सुकतावश तथा आनंददायक भ्रमण के लिए की जाने वाली यात्रा को करने वाला व्यक्ति पर्यटक कहलाता है ।

 

ळसवेेंतल व िजवनतपेउ ंदक जतंअमस के अनुसार-

ज्वनतपेउ पे जीम चतंबजपबम व िजवनतपदह वत जतंअमसपदह वित चसमंेनतम व ितमबतमंजपवद ंदक जीम हनपकंदबम वत उंदंहमउमदज व िजवनतपेज ंे ं इनेपदमेेण्

 

इस परिभाषा के अनुसार- ’’पयर्टन एक व्यवसाय अथवा प्रबंधन है, जो पर्यटकों को सुविधा उपलब्ध करता है तथा पर्यटन का आयोजन करता है ।

 

छत्तीसगढ़ की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर, प्राकृतिक मनोरम दृश्यावली, ग्राम्य जनजीवन, लोक कला एवं संस्कृति की विविधता ने पर्यटकों को सदैव आकर्षित किया है ।

 

किसी प्रदेश में जितने अधिक सुंदर एवं आकर्षक, प्राकृतिक रमणीक तथा ऐतिहासिक स्थल होंगे, वहीं पर्यटन के विकास की गति उतनी ही तीव्र होगी । छत्तीसगढ़ की भूमि पर भी प्रकृति सहज सुषमा बिखेरती हुई, समशीतोष्ण जलवायु जैसे स्वास्थ्यप्रद वातावरण का पोषण करती है । यहाँ प्राकृतिक संसाधनों का अक्षय निधि खनिज व विस्तृत वन परिक्षेत्र के रूप में संरक्षित है ।

 

पर्यटन संवर्धन के लिए आवश्यक दशाएँ:-

01.   पर्यटन क्षेत्र की स्थिति एवं उस प्रदेश में पर्यटकों के आकर्षण केन्द्रों का होना ।

02.   पर्यटन क्षेत्र में यातायात व भ्रमण की सुविधाएँ ।

03.   पर्यटकों के अनुकूल वातावरण ।

04.   पर्यटकों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता ।

05.   प्रदूषण मुक्त पर्यटक स्थल एवं वातावरण ।

 

छत्तीसगढ़ में पर्यटन की इन परिस्थितियों की उपलब्धता है । यहाँ की क्षेत्रीय संस्कृति, रीति-रिवाज, मेले, त्यौहार, वेशभूषाएँ, भाषा, नदियाँ, जलाशय, धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल, औद्योगिक केन्द्र एवं विभिन्न प्रजाति के वन्य प्राणी पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं । आर्थिक विकास की नई प्रणाली अपनाते हुए राज्य शासन ने नई पर्यटन नीति, अन्य भारतीय राज्यों एवं आसपास के विभिन्न देशों की उत्कृष्ट रीतियों के विस्तृत विश्लेषण पर विकसित की है । विश्व की प्राचीनतम रंगशाला, रामगढ़ की गुफाएँ, छत्तीसगढ़ के नियाग्रा के नाम से विख्यात चित्रकोट (बस्तर) का जनप्रपात, अंधी मछलियों के लिए प्रसिद्ध चूने के अवक्षेपों में निर्मित कुटुमसर की गुफायें, सदाबहार जंगलों और विलक्षण जैव विविधता, बस्तर और सरगुजा के विशाल आदिवासी अंचल, विशिष्ट आदिवासी संस्कृति, बारहमासी जनप्रपात, दुर्लभ वन्य जातियों का यहाँ बाहुल्य है ।

 

पर्यटन का संबंध उद्योग, वाणिज्य एवं परिवहन इत्यादि के साथ करीब का है । शासन द्वारा इन अंतर्संबंधों का उपयोग बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध कराने एवं सामाजिक सद्भाव विकसित करने में किया जा सकता है ।

 

पर्यटन नीति के मुख्य उद्देश्य:-

01.   राज्य में आर्थिक, सांस्कृतिक एवं पारिस्थितिकीय दृष्टि से उपयोगी पर्यटन को प्रोत्साहन देना ।

02.   छत्तीसगढ़ में पर्यटन अनुभव की गुणवत्ता एवं आकर्षण को सुदृढ़ करना ।

03.   राज्य की समृद्ध एवं विविध रूपों वाली सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, संवर्धन एवं प्रचार-प्रसार करना ।

04.   आर्थिक विकास एवं संबंधित क्षेत्रों में पर्यटन के योगदान में वृद्धि करना ।

05.   पर्यटन संबंधित अधोसंरचना के विकास में निजी निवेशकों के प्रयत्नों को प्रोत्साहित करना ।

06.   पर्यटन के क्षेत्र में नई अवधारणाएँ जैसे टाईम शेयर, इको पर्यटन, ग्राम पर्यटन, साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देना ।

07.   स्थानीय समुदाय की बौद्धिक संपदा एवं अधिकारों को सम्मान देना ।

 

राज्य शासन द्वारा पर्यटन के क्षेत्र में किये गए विशिष्ट प्रयास:-

01.   अधोसंरचना एवं संस्थागत विकास- शासकीय व निजी क्षेत्रों की सहभागिता ।

02.   पर्यटन उत्पाद प्रदाय- हथकरधा, हस्तशिल्प, खाद्य एवं वनौषधि जैसे उत्पादकों का विक्रय ।

03.   विपणन- पैकेज टूर तैयार करना, हैरीटेड इंडिया योजना को प्रोत्साहन, विश्व पर्यटन कोष की स्थापना, मनोरंजन कर से छूट प्रदान करना ।

 

मूलभूत अंतर्संबंध एवं मानव संसाधन का विकास:-

01.   पर्यटन केन्द्रों हेतु सड़क नेटवर्क का सुधार ।

02.   सभी पर्यटन स्थलों पर मीटर लगी टैक्सी एवं संचालित भ्रमण सुविधाओं में वृद्धि करना ।

03.   पर्यटक बसों की संख्या में वृद्धि एवं मुख्य पर्यटन केन्द्रों को जोड़ने वाली सड़कों पर सड़क किनारे पर्यटन सुविधाओं एवं पेट्रोल पंपों की व्यवस्था ।

04.   भारतीय रेल के सहयोग से चयनित पर्यटन स्थलों तक पर्यटन, रेल प्रारंभ करने की संभावनाओं का मूल्यांकन करना।

05.   राज्य के प्रमुख शहरों के हवाई अड्डों, रेल्वे स्टेशनों एवं अड्डों पर अग्रिम भुगतान सुविधाओं की स्थापना ।

06.   पर्यटन के दूरस्थ क्षेत्रों में हेलीकाॅप्टर सुविधाओं को प्रोत्साहित करना ।

07.   प्राथमक स्तर तक के कार्यकर्ताओं एवं गाइडों के प्रशिक्षण को सुदृढ़ एवं व्यवस्थित करना ।

08.   पर्यटन एवं उससे संबंधित उद्योगों हेतु प्रशिक्षण की आवश्यकतानुसार कार्यप्रणाली विकसित करना ।

09.   होटल प्रबंधन, प्रशिक्षण संस्थाओं की स्थापना को प्रोत्साहन ।

10.   निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहन ।

 

संस्थागत संरचना हेतु उपाय:-

01.   राज्य में पर्यटन विकास मंडल का गठन किया जाय ।

02.   राष्ट्रीय पर्यटन नीति के अनुरूप पर्यटन भवन का विकास ।

03.   जिला पर्यटन प्रवर्तक परिषदों की स्थापना ।

04.   पर्यटन व्यापार विनियम अधिनियम निर्मित करना ।

 

पर्यटन की समृद्ध संभावना के क्षेत्र:-

01.   पारिस्थितिकी पर्यटन- औषधि एवं हर्बल उद्यानों का विकास।

02.   सांस्कृतिक धरोहर- पुरातात्विक धरोहरों का रख-रखाव सुदृढ़ ।

03.   ग्रामीण पर्यटन- स्थलीय त्यौहार, बस्तर दशहरा, भोरमदेव उत्सव, राउत नाचा आदि को प्रोत्साहन ।

04.   साहसिक पर्यटन- ट्रैकिंग, पर्वतारोहण, नौकायान, वाटर राफ्टिंग आदि का विकास ।

05.   तीर्थ पर्यटन- धर्मशाला का विकास, राजिम, रतनपुर, सिरपुर को राष्ट्रीय तीर्थ की दृष्टि से विकसित करना ।

06.   व्यापार-सह मनोरंजन पर्यटन- राज्य में स्टेट आॅफ आर्ट कन्वेशन केन्द्रों, सेमीनार हाल आदि की स्थापना ।

07.   प्रभावशाली विपणन- पर्यटकों के अनुभव में सुधार एवं राज्य को पर्यटन हेतु एक विशिष्ट एवं अनूठे राज्य का दर्जा दिलाने हेतु राज्य शासन एक नवीन विपणन योजना उद्योगपतियों, हितग्राहियों एवं स्थानीय जनता के माध्यम से क्रियान्वित करेगा । पेशेवर विज्ञापन संस्थाओं, जनसंपर्क कंपनियों के साथ-साथ निजी क्षेत्रों को शामिल कर स्थानीय लोगों से खरीदी में सहभागिता सुनिश्चित करेगा ।

08.   पर्यटन के विकास के लिए मौद्रिक एवं अमौद्रिक पारितोषिकों की स्थापना करना।

09.   पर्यटन से संबंधित सूचना एवं प्रसार हेतु पर्यटन पोर्टल, टच स्कीन इन्फर्मेशन किओवस, मल्टी मीडिया, सी.डी. को विकसित करना ।

 

इस प्रकार छत्तीसगढ़ राज्य की पर्यटन नीति के जरिए पर्यटन को एक रोजगारपरक उद्योग बनाया जा सकता है । आँकड़े के अनुसार भारत की धरती पर एक विदेशी पर्यटक जब कदम रखता है और वापस जाता है, तब तक औसतन दो दर्जन लोगों को रोजगार उपलब्ध करा जाता है । छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक धरोहर समृद्ध है । पर्यटन की संभावनाएँ अनंत हैं, जरूरत है प्रदूषणमुक्त वातावरण का निर्माण कर देशी-विदेशी पर्यटकों को मिलने वाली आकर्षक सुविधाओं की । छत्तीसगढ़ को प्रकृति और पूर्वजों ने इतना समृद्ध किया है कि दूसरे कई प्रदेश तुलनात्मक रूप से असमृद्ध हैं । छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थल को इंडोनेशिया के बौली नामक पर्यटन स्थल जैसे बनाने की जरूरत है, जहाँ 60-65 लाख विदेशी मैलाली पहुँचाते हैं । इन सबके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ का ग्राम्य जीवन यहाँ की आदिवासियों की संस्कृति, परंपराएँ, त्यौहार, उत्सव आदि अपने अनोखे रूप के कारण पर्यटकों को आकर्षित करते हैं । इनमें बस्तर का दशहरा विश्व प्रसिद्ध है ।

 

इस प्रकार यहाँ पर्यटन स्थल में अच्छे पर्यटन स्थल के सभी गुण हैं । यहाँ के पर्यटकों को अपनी रूचि के अनुसार पर्यटन स्थलों का चयन कर भ्रमण करने की सुविधा है ।

 

सुझाव:-

01.   कुछ पर्यटन स्थलों का चुनाव कर उसमें ट्रेकिंग, कैपींग जैसी सुविधाएँ विकसित किया जाये।

02.   पुराने महल, हवेली और बाड़ों को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विकसित करने की योजना।

03.   टूरिस्ट सर्किट के द्वारा पर्यटन के लिए पैकेज टूर की योजना ।

04.   हैरिटेज इंडिया योजना में छत्तीसगढ़ के राजमहलों को शामिल किया जाये ।

05.   सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्थानीय कला एवं शिल्प कलाओं को प्रोत्साहन ।

06.   स्थानीय लोगों को रोजगार प्रदान करना ।

07.   छत्तीसगढ़ में पर्यावरण, पुरातत्व एवं पर्यटन के विकास हेतु पर्यावरण एवं पर्यटन विकास समिति का गठन ।

08.   परिवहन की सुविधा, भोजन, जलपान की उचित व्यवस्था करना ।

09.   छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थलों को राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर अंकित करना ।

10.   प्रदूषण मुक्त वातावरण का निर्माण, दंगा, नक्सलवाद जैसे आतंक को दूर करना।

 

निष्कर्ष-

छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक पुरातात्विक, धार्मिक व प्राकृतिक स्थल इतने मनोरम हैं कि पर्यटकों को बरबस ही अपने ओर आकर्षित करते हैं । जरूरत है कुछ इच्छा शक्ति और जागरूकता की ।

 

पर्यावरणीय प्रदूषण का अध्ययन ; ैजनकल व िम्दअपतवदउमदजंस च्वससनजपवदद्ध

पर्यावरणीय प्रदूषण से आशय लोगों के आसपास के क्षेत्र को प्रदूषण करना है । यह कार्य मुख्यतः लोगों द्वारा ही उनके गलत कार्य से होता है । वायु, जल, भूमि प्रदूषण मनुष्य तथा अन्य जीवधारियों के लिए हानिप्रद है । अतः संरक्षण आवश्यक है ।

 

पर्यावरण संरक्षण क्षेत्र:-

01.   जल का अत्यधिक दुरूपयोग ।

02.   विविध कार्यकलापों में वायु की अनिरापरता ।

03.   खिलौने व इमारती लकड़ी के लिए वृक्षों का उपयोग ।

04.   उपजाऊ मिट्टी से ईंटों का बनाना ।

05.   उद्योगों से होने वाले विषैले बर्हिस्राव से जलीय जीवों का विनाश ।

06.   खाली तथा अन्य अंगों की तस्करी के लिए वन्य जीवों की हत्याएँ ।

07.   रासायनिक खादों के अधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में हा्रस ।

08.   पानी के गलत उपयोग से शुद्ध पीने के पानी की मात्रा में निरंतर कमी ।

09.   आवास और बांधों के निर्माण हेतु वन क्षेत्रों की कटाई ।

 

पर्यावरण प्रदूषण क्षेत्र:-

01.   शादी, समारोह व कीर्तन स्थलों पर ध्वनि विस्तारक यंत्रों का उपयोग ।

02.   जनसंख्या वृद्धि से आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि में कमी ।

03.   घर की गंदगी को कहीं भी फेंक देना ।

04.   परिवहन साधनों से वायु की अशुद्धता ।

05.   परमाणु बम का परीक्षण से नाभिकीय विकिरण प्रदूषण ।

 

पर्यावरण सुधार क्षेत्र:-

01.   विभिन्न पर्यावरणीय कानून की अवहेलना ।

02.   सरकार अथवा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले सघन वृक्षारोपण जैसे कार्यक्रमों में रूचि न लेना ।

03.   पर्यावरण के बारे में जानने का प्रयास भी नहीं करना ।

04.   भोजन, जल, वायु और प्रकाश की उपलब्धता की ओर ध्यान न देना ।

05.   जीवन की गुणवत्ता की प्राणित के लिए न इच्छा रखना और न परवाह करना ।   

 

पर्यावरण के क्षेत्र में स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा किये जा रहे कार्य:-

01.   समाज और सरकार के मध्य तालमेल बिठाना ।

02.   पर्यावरण शिक्षा, चेतना तथा जनजागृति के कार्य ।

03.   समाज की समस्याओं को सरकारों तक पहुँचाना और उनको सही कार्य करने को बाध्य करना ।

04.   समाज हित में कानून की सहायता लेना ।

      अतः यही कार्य करने की अपेक्षा भी समाज और प्रशासन दोनों को स्वयंसेवी संस्थाओं में करनी चाहिए ।

 

संदर्भ ग्रंथ-सूची

01.   सुश्री अंजू मुखर्जी- पर्यावरण परिचय, छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी, रायपुर, 2007.

02.   डाॅ. प्रदीप कुमार- पर्यावरण प्रदूषण, डिस्कवरी पब्लिशिंग हाऊस, नई दिल्ली, 2007.

03.   डाॅ. ए. राजशेखर- पर्यावरण अध्ययन, दिव्या प्रकाशन, रायपुर।

04.   मनोज कुमार- पर्यावरण संरक्षण, कुनाल प्रकाशन, दिल्ली, 2006.

05.   दिलीप कुमार मार्कण्डेय एवं नीलिमा राजवैद्य- प्रकृति, पर्यावरण प्रदूषण एवं नियंत्रण, ए.पी.एच. पब्लिशिंग कारपोरेशन, 1999.

06.   डाॅ. प्रदीप शुक्ला एवं सीमा पाण्डेय- छत्तीसगढ़ में पर्यटन, वैभव प्रकाशन, रायपुर ।

 

 

 

Received on 30.05.2013

Revised on 03.07.2013

Accepted on 12.07.2013     

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Research J. Humanities and Social Sciences. 4(3): July-September,  2013, 373-376